**अध्याय 6: "परछाई की पुकार"**
"जब ऋचा ने खुद बताया अपना राज़"*
आरव ने गंगा के किनारे ऋचा की परछाई को पुकारा—*"तू है कौन? मेरी बहन है या कोई भूत?"*
परछाई ने मुस्कुराते हुए हाथ बढ़ाया। पानी में उसकी उंगली से लिखा—*"मैं वो सच हूँ जिसे गंगा ने निगल लिया था।"*
**दृश्य:**
ऋचा की आवाज़ हवा में गूँजी—*"भैया, मैं उस आश्रम में जिंदा थी... जहाँ तुम्हारी माँ सुनीता ने मुझे छुपा रखा था।"*
आरव का दिल धक से रह गया। *"माँ? पर वो तो मर चुकी है!"*
*"नहीं,"* ऋचा की परछाई ने आँखें नीची की—*"वो आश्रम की साध्वी बन गई थी... और मुझे भूल गई।"*
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### **क्लाइमैक्स: साध्वी का सच**
आरव, रागिनी और कबीर ने डूबे आश्रम में घुसकर देखा—एक **जीवित सुनीता** ध्यानमग्न बैठी थी! उसकी गोद में वही पुस्तक थी जिसमें *"शापित विवाह"* का जिक्र था।
सुनीता ने आँखें खोलीं—*"मैंने ऋचा को इसलिए छुपाया क्योंकि मिश्रा परिवार उसे मार डालता... पर तुम सबने मेरी मौत का झूठ बुन दिया!"*
**ट्विस्ट:** शिव पत्थरों को मिलाकर जो पुस्तक बनी, उसमें लिखा था—*"शादी नहीं, **माफ़ी** श्राप तोड़ेगी।"*
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### **कमेंट से चलेगा प्लॉट!**
"अगले अध्याय के लिए **वोट करें**:
1. 🕊️ सुनीता का बलिदान
2. 💔 रागिनी-कबीर की माफ़ी
3. 👻 ऋचा की मुक्ति
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